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MRR Journal

Abstract

Indian Journal of Modern Research and Reviews, 2025; 3(10): 59-67

जसनाथ सम्प्रदाय के साहित्य में लोकचेतना, पर्यावरण बोध और सामाजिक सुधार: एक अंतर्विषयक अध्ययन

Author Name: Mahesh Choudhary, Dr. Geljibhai Bhatiya

1. Research scholar, Department of Hindi, Faculty of Language and Literature, Gujarat Vidyapith, Ahmedabad, India

2. Associate Professor, Department of Hindi, Faculty of Language and Literature, Gujarat Vidyapith, Ahmedabad, India

Abstract

<p>भारतीय संत परंपरा में जसनाथ सम्प्रदाय का स्थान विशिष्ट है, विशेषतः पश्चिमी राजस्थान के सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय संदर्भों में। जसनाथ सम्प्रदाय का साहित्य केवल धार्मिक उपदेशों तक सीमित न होकर लोकचेतना, प्रकृति-संरक्षण और सामाजिक सुधार की एक समग्र वैचारिक संरचना प्रस्तुत करता है। यह शोध-पत्र जसनाथी साहित्य में निहित लोकचेतना, पर्यावरण बोध तथा सामाजिक सुधार के आयामों का आलोचनात्मक एवं अंतर्विषयक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अध्ययन का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि किस प्रकार यह साहित्य लोकजीवन से जुड़कर सामाजिक नैतिकता, पर्यावरणीय संतुलन और समतामूलक समाज की स्थापना की दिशा में योगदान देता है। शोध में पाठीय विश्लेषण, ऐतिहासिक संदर्भ और विषयवस्तु आधारित पद्धति का प्रयोग किया गया है। परिणाम दर्शाते हैं कि जसनाथ सम्प्रदाय का साहित्य आधुनिक पर्यावरणीय विमर्श और सामाजिक न्याय के सिद्धांतों से गहरे रूप में जुड़ा हुआ है। भारतीय संत साहित्य केवल आध्यात्मिक साधना का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और नैतिकता का महत्वपूर्ण आधार रहा है। कबीर, रैदास, नानक आदि संतों ने मध्यकालीन समाज में व्याप्त जातिगत अन्याय, रूढ़ियों और असमानताओं के विरुद्ध मानवीय दृष्टि विकसित की। इसी परंपरा में राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्र में उदित जसनाथ सम्प्रदाय विशेष रूप से प्रकृति-संरक्षण, संयमित जीवन और सामाजिक समरसता पर आधारित दर्शन प्रस्तुत करता है। कठोर मरुस्थलीय परिस्थितियों ने इस सम्प्रदाय को सहअस्तित्व और पर्यावरण-संतुलन के सिद्धांत की ओर अग्रसर किया। जसनाथी साहित्य लोकभाषा में रचित होने के कारण जनजीवन, कृषि, पशुपालन और जल-संरक्षण जैसे विषयों से गहराई से जुड़ता है। यह धर्म को सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ जोड़कर करुणा, संयम और समता को जीवन-मूल्य के रूप में स्थापित करता है। इस साहित्य की केंद्रीय अवधारणा पर्यावरण बोध है, जिसमें वृक्षों की रक्षा, जल-संरक्षण और पशु-हित को व्यावहारिक जीवन-नीति माना गया है। साथ ही, यह लोकचेतना को जाग्रत कर सामाजिक कुरीतियों, हिंसा और विभेद का विरोध करता है। समकालीन पर्यावरणीय संकट और सामाजिक असमानताओं के संदर्भ में जसनाथी साहित्य के विचार अत्यंत प्रासंगिक हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र इसी साहित्य की लोकचेतना, पर्यावरण बोध और सामाजिक सुधार की भूमिका का समग्र अध्ययन करता है।</p>

Keywords

असृग्दरा, विकारग्रस्त गर्भाशयी रक्तस्राव, प्रदरारी चूर्ण, पुष्यानुग चूर्ण, यादृच्छिक नियंत्रित परीक्षण