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Indian Journal of Modern Research and Reviews, 2024; 2(12):39-44

भारतीय शिक्षा का क्रमिक विकास और सुधार की दिशा

Authors: कविता कुमारी; डॉ. रेणु गुप्ता;

1. शोधार्थी,वाई.बी.एन यूनिवर्सिटी, रांची, झारखण्ड, भारत

2. शोध निर्देशिका, सहायक प्राध्यापक, वाई.बी.एन यूनिवर्सिटी, रांची, झारखण्ड, भारत

Paper Type: Research Paper
Article Information
Received: 2024-10-12   |   Accepted: 2024-11-28   |   Published: 2024-12-29
Abstract

भूमिका-भारत के इतिहास और संस्कृति में शिक्षा को सदा से सर्वोच्च स्थान प्राप्त रहा है। यह देश विश्व की उन प्राचीनतम सभ्यताओं में से एक है जिसने ज्ञान और विद्या को जीवन की दिशा और समाज की संरचना का मूल आधार माना। यहाँ शिक्षा केवल जीविका अर्जित करने का साधन नहीं रही, बल्कि आत्मा के उत्थान, धर्म और संस्कृति की रक्षा तथा समाज की उन्नति का माध्यम भी रही है। भारत में शिक्षा का ऐतिहासिक विकास हजारों वर्षों की यात्रा है, जिसमें गुरुकुल प्रणाली से लेकर आधुनिक विश्वविद्यालयों और नीतिगत सुधारों तक के अनेक चरण सम्मिलित हैं। इस यात्रा में जहाँ एक ओर परंपरागत शास्त्रीय विद्या और धार्मिक शिक्षण केंद्रित रहे, वहीं दूसरी ओर आधुनिक काल में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तकनीकी कौशल और लोकतांत्रिक आवश्यकताओं ने शिक्षा की संरचना को नया रूप दिया।

प्राचीन भारत में शिक्षा का स्वरूप अत्यंत समृद्ध और व्यवस्थित था। गुरुकुल प्रणाली शिक्षा का मूल आधार थी, जहाँ विद्यार्थी गुरु के आश्रम में रहकर वेद, उपनिषद, व्याकरण, दर्शन, आयुर्वेद, खगोलशास्त्र और नैतिक जीवन मूल्यों की शिक्षा ग्रहण करते थे। शिक्षा का उद्देश्य केवल ज्ञान प्राप्ति नहीं बल्कि चरित्र निर्माण और समाजोपयोगी व्यक्तित्व का निर्माण था। इस काल में शिक्षा निःशुल्क होती थी और विद्यार्थियों को ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए अनुशासन और आत्मसंयम का अभ्यास करना पड़ता था। तक्षशिला, नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय उस समय विश्वविख्यात थे, जहाँ न केवल भारत बल्कि विदेशों से भी विद्यार्थी अध्ययन हेतु आते थे। इन संस्थानों में चिकित्सा, गणित, ज्योतिष, राजनीति, न्यायशास्त्र और बौद्ध दर्शन जैसे विषय पढ़ाए जाते थे। मध्यकालीन भारत में शिक्षा का स्वरूप कुछ परिवर्तित हुआ। इस काल में मदरसे और मक़तब ज्ञान के प्रमुख केंद्र बने। यहाँ इस्लामी धर्मशास्त्र, अरबी और फारसी भाषा, साहित्य और गणित की शिक्षा दी जाती थी। साथ ही संस्कृत पंडित और पाठीशालाएँ भी विद्यमान रहीं, जहाँ वैदिक और शास्त्रीय अध्ययन जारी रहा। मध्यकालीन भारत की शिक्षा में धार्मिक शिक्षा का प्रभाव अधिक था और व्यावहारिक विज्ञान तथा तकनीकी विषयों पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया गया। इसके बावजूद इस युग में साहित्य, संगीत, स्थापत्य और कला का विकास शिक्षा के सहारे ही संभव हुआ।

स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी— शिक्षा का सार्वभौमिकरण और इसे राष्ट्रीय विकास का साधन बनाना। 1947 में देश की साक्षरता दर मात्र 12% थी और अधिकांश जनसंख्या शिक्षा से वंचित थी। ऐसे में नीतिगत स्तर पर शिक्षा को प्राथमिकता देना अनिवार्य था। 1948 में राधाकृष्णन आयोग गठित हुआ, जिसने उच्च शिक्षा की दिशा तय की। इसके बाद 1952 में मुदालियर आयोग ने माध्यमिक शिक्षा सुधारों पर बल दिया।

1964-66 में कोठारी आयोग ने शिक्षा की व्यापक समीक्षा की और यह सिफारिश की कि शिक्षा को राष्ट्रीय विकास का सबसे महत्वपूर्ण साधन माना जाए। आयोग ने “समान अवसर” और “सर्व शिक्षा” पर बल दिया और कहा कि शिक्षा को व्यावसायिक और तकनीकी आवश्यकताओं से जोड़ा जाए। कोठारी आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1968 में पहली राष्ट्रीय शिक्षा नीति लागू हुई, जिसमें प्राथमिक शिक्षा के सार्वभौमिकरण, मातृभाषा में शिक्षा, विज्ञान और तकनीकी पर जोर तथा शिक्षा के लोकतंत्रीकरण जैसे प्रावधान शामिल थे।

Keywords

शिक्षा, विकास, इतिहास, नीति, परंपरा, गुरुकुल, औपनिवेशिक शिक्षा, आधुनिक शिक्षा, मैकाले की नीति, वुड का डिस्पैच, राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलन, विश्वविद्यालय स्थापना, स्वतंत्रता के बाद सुधार, शिक्षा आयोग, राष्ट्रीय शिक्षा नीति, सर्वशिक्षा अभियान, साक्षरता, नई शिक्षा नीति 2020, तकनीकी शिक्षा, ज्ञान समाज।

How to Cite

. भारतीय शिक्षा का क्रमिक विकास और सुधार की दिशा. Indian Journal of Modern Research and Reviews. 2024; 2(12):39-44

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