Abstract
Indian Journal of Modern Research and Reviews, 2026; 4(10): 155-158
कृषि एवं ग्राम विकास संबंधी गांधी के विचार एवं प्रयोग: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन
Author Name: डॉ. नीरज कुमार निर्मल
Abstract
<p>प्रस्तुत शोध पत्र महात्मा गांधी के कृषि<em>, </em>कृषक स्वावलंबन तथा समग्र ग्रामीण पुनर्गठन संबंधी दार्शनिक दृष्टिकोण एवं ऐतिहासिक प्रयोगों का आलोचनात्मक मूल्यांकन करता है। गांधी का ग्राम स्वराज केवल राजनीतिक विकेंद्रीकरण का ढांचा नहीं था<em>, </em>बल्कि यह एक पारिस्थिकीय <em>,</em><em> </em>नैतिक एवं आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का समन्वित प्रारूप था। आधुनिक औद्योगीकरण और अनियंत्रित नगरीकरण की विभीषिका के बरक्स गांधी ने <em>'</em>ग्राम केंद्रित अर्थव्यवस्था<em>' </em>की वकालत की<em>, </em>जहाँ कृषि प्राथमिक संबल है तथा कुटीर व खादी उद्योग उसके पूरक। इस पत्र में दक्षिण अफ्रीका के फीनिक्स और टॉलस्टॉय फार्म से लेकर भारत में साबरमती<em>, </em>वर्धा एवं सेवाग्राम आश्रमों में किए गए व्यावहारिक कृषि प्रयोगों<em>, </em>जैविक खाद निर्माण<em>, </em>गोपालन तथा विकेंद्रीकृत ग्रामीण उत्पादन प्रणालियों का विश्लेषण किया गया है। समकालीन कृषि संकट<em>, </em>मृदा क्षरण तथा ग्रामीण पलायन के दौर में गांधीवादी कृषि दर्शन की सतत उपादेयता को भी यहाँ रेखांकित किया गया है।</p>
Keywords
ग्राम स्वराज, गांधीवादी कृषि, आत्मनिर्भरता, सर्वोदय, खादी एवं ग्रामोद्योग, सेवाग्राम, जैविक कृषि।
