Abstract
Indian Journal of Modern Research and Reviews, 2026; 4(10): 171-175
परंपरा और अस्तित्व का संगम: झारखंड में लैंगिकता, स्वदेशी ज्ञान और जलवायु अनुकूलन
Author Name: आरती कुमारी
Abstract
<p>यह लेख भारत के झारखंड राज्य के जलवायु-संवेदनशील ग्रामीण एवं वन-आश्रित क्षेत्रों में जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन का विश्लेषण नारीवादी पारिस्थितिकी<em> </em>के दृष्टिकोण से करता है<em>, </em>जिसमें स्वदेशी लोकज्ञान को केंद्रीय स्थान दिया गया है। नारीवादी पारिस्थितिकी यह समझने का आलोचनात्मक ढाँचा प्रदान करती है कि पर्यावरणीय ज्ञान<em>, </em>श्रम और संसाधनों तक पहुँच किस प्रकार लैंगिक सामाजिक संबंधों के माध्यम से संरचित होती है। झारखंड के स्वदेशी समुदाय अनियमित वर्षा<em>, </em>दीर्घकालिक सूखे<em>, </em>वन क्षरण और घटती कृषि उत्पादकता जैसी समस्याओं का सामना कर रहे हैं और इन परिस्थितियों में उन्होंने जलवायु जोखिमों को कम करने के लिए स्थानीय रूप से विकसित ज्ञान प्रणालियों पर निर्भरता बनाए रखी है।</p>
<p>इस अध्ययन से स्पष्ट होता है कि स्वदेशी लोकज्ञान में प्रभावी और संदर्भ-विशिष्ट जलवायु अनुकूलन रणनीतियाँ निहित हैं। पारंपरिक जल-संग्रह प्रणालियों ने शुष्क ऋतुओं के दौरान संवेदनशीलता को कम किया और पूरे वर्ष जल उपलब्धता में सुधार किया। मिश्रित फसल प्रणालियों और स्थानीय रूप से अनुकूलित बीजों के उपयोग से बदलती जलवायु परिस्थितियों में फसल क्षति की दर घटी और कृषि विविधता बनी रही। मानकीकृत कृषि कैलेंडरों की तुलना में मौसमी पारिस्थितिक संकेतकों जैसे मिट्टी की नमी<em>, </em>पुष्पन चक्र और वन संकेत ने कृषि निर्णयों को स्थानीय जलवायु परिवर्तनशीलता के अधिक अनुकूल बनाया। इन प्रथाओं को अपनाने वाले परिवारों में जलवायु तनाव की अवधि में अधिक खाद्य सुरक्षा और आजीविका स्थिरता देखी गई।</p>
<p>नारीवादी पारिस्थितिकी के दृष्टिकोण से यह अध्ययन दर्शाता है कि जलवायु ज्ञान के निर्माण और संरक्षण में महिलाओं की भूमिका केंद्रीय है। बीज-संरक्षण<em>, </em>खाद्य संरक्षण<em>, </em>ईंधन और जल प्रबंधन तथा औषधीय पौधों का उपयोग मुख्यतः महिलाओं द्वारा किया जाता है<em>, </em>जो घरेलू पोषण<em>, </em>स्वास्थ्य और सहनशीलता को बनाए रखने में निर्णायक सिद्ध होता है। इसके बावजूद<em>, </em>झारखंड की जलवायु और पर्यावरणीय शासन संरचनाएँ महिलाओं के इस ज्ञान को प्रायः निर्णय-प्रक्रियाओं से बाहर रखती हैं। लेख तर्क देता है कि महिलाओं के पारिस्थितिक ज्ञान को जलवायु नीति और स्थानीय शासन में सम्मिलित किए बिना टिकाऊ और न्यायपूर्ण जलवायु अनुकूलन संभव नहीं है।</p>
Keywords
नारीवादी पारिस्थितिकी; स्वदेशी लोकज्ञान; जलवायु अनुकूलन; लैंगिकता; झारखंड
