Abstract
Indian Journal of Modern Research and Reviews, 2026; 4(1): 29-31
रामायण एवं महाभारत में भारतीय संस्कृति में योगदान
Author Name: डॉ. अनिता धाकड़, नेमीचन्द्र सैनी
Abstract
<p>भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीनतम एवं समृद्ध संस्कृतियों में से एक है<em>, </em>जिसकी निरंतरता<em>, </em>सहिष्णुता और जीवन-मूल्यपरक दृष्टि इसे विशिष्ट बनाती है। इस संस्कृति के निर्माण<em>, </em>संरक्षण एवं विकास में<em> </em>रामायण<em> </em>और<em> </em>महाभारत<em> </em>जैसे महाकाव्यों की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण रही है। ये दोनों ग्रंथ न केवल साहित्यिक कृतियाँ हैं<em>, </em>बल्कि भारतीय समाज की सामूहिक चेतना<em>, </em>नैतिक मूल्यों<em>, </em>सामाजिक संरचना तथा दार्शनिक चिंतन के आधार स्तंभ भी हैं।</p>
<p>रामायण भारतीय संस्कृति के आदर्शवादी स्वरूप को प्रस्तुत करती है<em>, </em>जहाँ धर्म<em>, </em>मर्यादा<em>, </em>कर्तव्य<em>, </em>पारिवारिक मूल्य और आदर्श शासन की संकल्पना स्पष्ट रूप से उभरकर आती है। इसके विपरीत<em>, </em>महाभारत जीवन की यथार्थवादी जटिलताओं<em>, </em>धर्म के द्वंद्वात्मक स्वरूप<em>, </em>सत्ता-संघर्ष<em>, </em>नैतिक दुविधाओं तथा सामाजिक प्रश्नों को उजागर करता है। श्रीमद्भगवद्गीता के माध्यम से कर्मयोग<em>, </em>ज्ञानयोग और भक्तियोग का समन्वय भारतीय सांस्कृतिक चेतना को दार्शनिक गहराई प्रदान करता है।</p>
<p>प्रस्तुत शोध में रामायण और महाभारत में निहित सांस्कृतिक तत्त्वों का तुलनात्मक<em>, </em>विश्लेषणात्मक एवं आलोचनात्मक अध्ययन किया गया है। अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि ये दोनों महाकाव्य मिलकर भारतीय संस्कृति को संतुलित<em>, </em>जीवंत और कालातीत स्वरूप प्रदान करते हैं<em>, </em>जिसकी प्रासंगिकता समकालीन वैश्विक संदर्भों में भी बनी हुई है।</p>
Keywords
रामायण, महाभारत, भारतीय संस्कृति, धर्म, कर्म, मर्यादा, आदर्शवाद, यथार्थवाद, नारी चेतना, राजधर्म, श्रीमद्भगवद्गीता
