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MRR Journal

Abstract

Indian Journal of Modern Research and Reviews, 2026; 4(1): 66-68

भारतीय ज्ञान परम्परा और शिक्षा

Author Name: डॉ. अनिता धाकड़

1. असिस्टेंट प्रोफेसर, ज्योति महिला विद्यापीठ महला, जयपुर, राजस्थान, भारत

Abstract

<p>भारतीय ज्ञान परंपरा<em>, </em>जिसे भारतीय ज्ञान प्रणाली भी कहा जाता है<em>, </em>भारत की प्राचीन ज्ञान और शिक्षा की एक<em> </em>समृद्ध एवं विविध<em> </em>प्रणाली है। इसमें वेदों<em>, </em>उपनिषदों<em>, </em>पुराणों<em>, </em>शास्त्रों तथा लोक-साहित्य में निहित ज्ञान सम्मिलित है। यह ज्ञान केवल दार्शनिक और आध्यात्मिक ही नहीं<em>, </em>बल्कि खगोल<em>, </em>चिकित्सा<em>, </em>विज्ञान<em>, </em>गणित आदि विषयों पर भी आधारित है।</p>

<p>भारतीय ज्ञान परंपरा का आरंभ भारतीय भू-भाग में हुआ है<em>, </em>इसलिए इसे भारतीय परंपरा कहा गया है। जिस विषय या परंपरा का प्रारंभ जहाँ से होता है<em>, </em>वही उसकी पहचान होती है। यह परंपरा सभी को<em> </em>एकता के सूत्र में बाँधने वाली<em> </em>है।</p>

<p>प्राचीन भारतीय ज्ञान प्रणालियों में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। महिलाओं ने दर्शन<em>, </em>विज्ञान<em>, </em>चिकित्सा<em>, </em>साहित्य और कला जैसे विषयों में योगदान दिया<em>, </em>उनका अभ्यास किया तथा ज्ञान की संरक्षक के रूप में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया। कई विदुषी महिलाओं ने विद्वान<em>, </em>संत और कलाकार के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की है। भाषा के क्षेत्र में भी अनेक विदुषी महिलाओं का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।</p>

<p>महर्षि पाणिनि के अनुसार वेदों को समझने के लिए शब्दों के अर्थ का ज्ञान आवश्यक है<em>, </em>और यह ज्ञान व्याकरण के माध्यम से ही संभव है। व्याकरण वेदों का एक प्रमुख अंग है<em>, </em>जिसमें भी महिलाओं की भूमिका उल्लेखनीय रही है।</p>

<p>महिलाएँ केवल ज्ञान की संरक्षिका और प्रसारक ही नहीं रहीं<em>, </em>बल्कि उन्होंने विभिन्न बौद्धिक और आध्यात्मिक क्षेत्रों में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। प्राचीन काल से ही महिलाओं को शिक्षा<em>, </em>कला<em>, </em>साहित्य और विज्ञान जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण स्थान प्रदान किया गया है।</p>

Keywords

ज्ञान परम्परा, सिक्ततकरण, संरक्षक्षका, वैददक काल.