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MRR Journal

Abstract

Indian Journal of Modern Research and Reviews, 2026; 4(3): 43-45

ग्रामीण समाज में महिला सशक्तिकरण की अवधारणा

Author Name: पूनम गर्ग, करुणा त्यागी

1. परास्नातक शोधार्थी, समाजशास्त्र विभाग, ताराचंद वैदिक पुत्री डिग्री कॉलेज, मुज़फ्फरनगर, उत्तर प्रदेश, भारत

2. शोध निर्देशक, समाजशास्त्र विभाग, ताराचंद वैदिक पुत्री डिग्री कॉलेज, मुज़फ्फरनगर, उत्तर प्रदेश, भारत

Abstract

<p>ग्रामीण समाज में महिला सशक्तिकरण का अर्थ है महिलाओं को सामाजिक<em>, </em>आर्थिक<em>, </em>राजनीतिक और शैक्षिक रूप से सक्षम बनाना हैंद्य ताकि वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हों सकेद्य और आत्मनिर्भर जीवन जी सकें। भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएँ परिवार और कृषि कार्यों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं<em>, </em>फिर भी उन्हें लंबे समय तक शिक्षा<em>, </em>स्वास्थ्य<em>, </em>संपत्ति और निर्णय लेने के अधिकारों से वंचित रखा गया। महिला सशक्तिकरण के माध्यम से ग्रामीण महिलाएँ शिक्षा प्राप्त कर रही हैं<em>, </em>स्वयं सहायता समूहों से जुड़कर आर्थिक रूप से मजबूत बन रही हैं तथा पंचायतों में भागीदारी के द्वारा राजनीतिक रूप से सक्रिय हो रही हैं। सरकारी योजनाएँ जैसे बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ<em>, </em>राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन आदि ने भी महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।हालाँकि अभी भी बाल विवाह<em>, </em>दहेज प्रथा<em>,</em><em> </em>अशिक्षा और लैंगिक भेदभाव जैसी समस्याएँ मौजूद हैं<em>, </em>जो सशक्तिकरण की राह में बाधा हैं। अतः आवश्यक है कि शिक्षा<em>, </em>जागरूकता और समान अवसरों के माध्यम से महिलाओं को सशक्त बनाया जाए। ग्रामीण महिला सशक्तिकरण न केवल परिवार बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र के विकास की आधारशिला है।ग्रामीण समाज में महिला सशक्तिकरण का तात्पर्य महिलाओं को उनके अधिकारों<em>, </em>कर्तव्यों और क्षमताओं के प्रति जागरूक कर उन्हें सामाजिक<em>, </em>आर्थिक और राजनीतिक रूप से सक्षम बनाना है। परंपरागत रूप से ग्रामीण महिलाएँ सीमित संसाधनों और अवसरों के बीच जीवन यापन करती रही हैं। शिक्षा की कमी और सामाजिक बंधनों के कारण वे आत्मनिर्भरता की दिशा में आगे नहीं बढ़ पाती थीं।</p>

Keywords

महिला सशक्तिकरण, ग्रामीण समाज, आत्मनिर्भर जागरूकता