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MRR Journal

Abstract

Indian Journal of Modern Research and Reviews, 2026; 4(3): 257-265

पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी: वास्तविक सशक्तिकरण बनाम 'सरपंच पति' की अवधारणा का समाजशास्त्रीय अध्ययन

Author Name: डॉ. विनय कुमार सिन्हा

1. असिस्टेंट प्रोफेसर, समाजशास्त्र विभाग, राजेन्द्र मिश्र महाविद्यालय सहरसा, बिहार भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा, बिहार, भारत

Abstract

<p>प्रस्तुत शोध पत्र<em> </em>भारतीय लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के ढांचे में महिलाओं की स्थिति और उनकी वास्तविक भूमिका का एक गहन समाजशास्त्रीय विश्लेषण करता है। भारतीय संविधान के<em> 73</em>वें संशोधन<em> </em>ने ग्रामीण स्थानीय निकायों में महिलाओं को आरक्षण प्रदान कर उन्हें सत्ता की मुख्यधारा से जोड़ने का ऐतिहासिक प्रयास किया है। हालांकि<em>, </em>धरातल पर यह सशक्तिकरण अक्सर<em> &#39;</em>सरपंच पति<em>&#39; </em>जैसी अनौपचारिक अवधारणाओं के कारण बाधित होता पाया गया है।</p>

<p>इस अध्ययन का मुख्य<em> </em>उद्देश्य<em> </em>उन सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों की पहचान करना है<em>, </em>जो निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों को स्वतंत्र निर्णय लेने से रोकते हैं। शोध की<em> </em>कार्यप्रणाली<em> </em>मुख्य रूप से गुणात्मक है<em>, </em>जिसमें प्राथमिक डेटा के रूप में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के साक्षात्कार और द्वितीयक स्रोतों के रूप में सरकारी रिपोर्टों का उपयोग किया गया है।</p>

<p>निष्कर्ष<em> </em>यह दर्शाते हैं कि शिक्षा का अभाव<em>, </em>पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना और घरेलू उत्तरदायित्वों का बोझ महिलाओं को <em>&#39;</em>नाममात्र का प्रमुख<em>&#39; (Proxy Candidate) </em>बना देता है<em>, </em>जहाँ वास्तविक प्रशासनिक और राजनैतिक शक्ति उनके परिवार के पुरुष सदस्यों (पति<em>, </em>पिता या पुत्र) के पास रहती है। अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि राजनीतिक आरक्षण केवल एक<em> </em>वैधानिक उपकरण<em> </em>है<em>; </em>वास्तविक सशक्तिकरण के लिए सामाजिक मानसिकता में परिवर्तन और संस्थागत सहयोग अनिवार्य है। जब तक <em>&#39;</em>सरपंच पति<em>&#39; </em>जैसी व्यवस्था का सामाजिक बहिष्कार नहीं होगा<em>, </em>तब तक महिलाओं की भागीदारी <em>&#39;</em>प्रतीकात्मक<em>&#39; </em>ही बनी रहेगी।</p>

Keywords

पंचायती राज, महिला सशक्तिकरण, 'सरपंच पति, पितृसत्ता, राजनीतिक भागीदारी, ७३वां संविधान संशोधन, ग्रामीण समाजशास्त्र।