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MRR Journal

Abstract

Indian Journal of Modern Research and Reviews, 2026; 4(3): 95-96

स्थानीय भाषाएँ, संस्कृति और लोक परम्पराएँ शिक्षण उपकरणक के रूप में

Author Name: जगदीश यादव

1. सहायक प्रोफेसर, हिंदी विभाग, चाँद गर्लस स्कूल महाविद्यालय, इटवा, सिद्धार्थनगर, उत्तर प्रदेश, भारत

Abstract

<p>भाषा भावों का सार कहा जाता है। पृथ्वी पर पाये जाने वाले प्रत्येक प्राणी तथा जीव की अपनी एक भाषा होती है। वह अपने मावो तथा विचारों को उसी के माध्यम से एक दूसरे के मध्य तक पहुंचाता है, एवं उनके भावों और विचारों को भी इसी भाव के माध्यम से समझता है। इसका रूप, अर्थ तथा लिपि भले ही अलग-अलग रूपो में हो सकता है। एक सर्वे के मुताबिक यह भी पाया गया हैं कि पूरे विश्व में लगभग तीन हजार से अधिक भाषा बोली जाती है। परन्तु बहुत सी बोलियों एवं भाषाएँ व्यवहारएवं लेखन में अपना स्थान ने बना पाने के कारण मृत्युपाय हो चुकी है। यह एक सभ्य तथा पढे लिखे समाज के लिए अभिशाप के समान भी माना जा सकता है।</p>

Keywords

शिक्षा सुधार, साक्षरता विकास, पाठ्यक्रम कार्यान्वयन, प्राथमिक शिक्षा, भारतीय शैक्षिक प्रणाली