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MRR Journal

Abstract

Indian Journal of Modern Research and Reviews, 2025; 3(11): 102-106

राजस्थान में ग्रामीण विकास में नाबार्ड की भूमिका का अध्ययन

Author Name: डॉ. कांता चौधरी, मंजू कंवर

1. सहायक आचार्य, अर्थशास्त्र विभाग, जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर, राजस्थान, भारत

2. शोधार्थी, अर्थशास्त्र विभाग, जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर, राजस्थान, भारत

Abstract

<p>प्रस्तुत अध्ययन राजस्थान में ग्रामीण विकास में नाबार्ड (राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक) की भूमिका का विश्लेषण करता है<em>, </em>जिसमें कृषि ऋण प्रवाह<em>, </em>स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) संयोजन और संस्थागत ऋण प्रदर्शन पर विशेष ध्यान दिया गया है। अध्ययन के मुख्य उद्देश्य राजस्थान की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नाबार्ड के प्रभाव का आकलन करना तथा कृषि एवं ग्रामीण विकास हेतु ऋण सहायता विस्तार में आने वाली चुनौतियों और संभावनाओं का अध्ययन करना है। वर्ष <em>2011 </em>से <em>2025 </em>तक के जिलावार संचयी आंकड़ों के आधार पर ग्यारह प्रमुख जिलों में ऋण वितरण<em>, </em>वसूली दर<em>, </em>एनपीए अनुपात और एसएचजी संयोजन का तुलनात्मक मूल्यांकन किया गया है। अध्ययन के निष्कर्ष क्षेत्रीय असमानताओं को स्पष्ट रूप से उजागर करते हैं &mdash; जयपुर <em>₹3,850 </em>करोड़ के ऋण वितरण और <em>92% </em>वसूली दर के साथ अग्रणी जिले के रूप में उभरा है<em>, </em>जबकि बाड़मेर और बीकानेर में अपेक्षाकृत कम वसूली दर और उच्च एनपीए स्तर कृषि-जलवायु संवेदनशीलता और सामाजिक-आर्थिक कमज़ोरियों को प्रतिबिंबित करते हैं। अध्ययन में कृषि ऋण पोर्टफोलियो में उच्च गैर-निष्पादित आस्तियाँ<em>, </em>आदिवासी क्षेत्रों में सीमित बैंकिंग अवसंरचना तथा बटाईदार किसानों का औपचारिक ऋण प्रणाली से बहिष्कार जैसी प्रमुख बाधाओं की पहचान की गई है। अध्ययन इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि केवल ऋण उपलब्धता सतत ग्रामीण विकास के लिए पर्याप्त नहीं है<em>; </em>इसके साथ फसल बीमा<em>, </em>जोखिम प्रबंधन तंत्र<em>, </em>डिजिटल वित्तीय सेवाओं और आजीविका विविधीकरण का एकीकरण अनिवार्य है। अध्ययन में क्षेत्र-विशिष्ट ऋण नियोजन<em>, </em>संस्थागत क्षमता सुदृढ़ीकरण और वित्तीय साक्षरता कार्यक्रमों के विस्तार की सिफारिश की गई है<em>, </em>ताकि राजस्थान में नाबार्ड के पुनर्वित्त कार्यों का विकासात्मक प्रभाव अधिकतम हो सके।</p>

Keywords

नाबार्ड, ग्रामीण विकास, कृषि ऋण, स्वयं सहायता समूह (एसएचजी), गैर-निष्पादित आस्तियाँ (एनपीए), ऋण वितरण, राजस्थान, वित्तीय समावेशन, क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, सूक्ष्म वित्त, ऋण वसूली, जोखिम प्रबंधन, ग्रामीण अवसंरचना, सहकारी ऋण