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MRR Journal

Abstract

Indian Journal of Modern Research and Reviews, 2025; 3(11): 116-124

प्रयोगवादी काव्य चिन्तन: प्रकृति और परिवेश

Author Name: प्रो. दीपक प्रकाश त्यागी प्रोफेसर,

1. हिन्दी एवं आधुनिक भारतीय भाषा तथा पत्रकारिता विभाग दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर, भारत

Abstract

<p>यह शोध-पत्र छायावादोत्तर हिन्दी काव्य-चिन्तन में प्रयोगवादी काव्यदृष्टि की प्रकृति एवं परिवेश का विश्लेषण करता है<em>, </em>जिसमें अज्ञेय के काव्य-चिन्तन को केन्द्रीय आधार के रूप में स्वीकार किया गया है। यह आलेख स्थापित करता है कि अज्ञेय ने छायावादी काव्य-परम्परा के पश्चात् हिन्दी काव्य-चिन्तन को एक सर्वथा नवीन दिशा प्रदान की<em>, </em>जिसमें पाश्चात्य मनोविश्लेषण-शास्त्र &mdash; विशेषतः फ्रायड<em>, </em>एडलर एवं युंग &mdash; तथा इलियट के सृजन-सिद्धान्त का गहरा प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। शोध-पत्र में यह विवेचन किया गया है कि अज्ञेय की दृष्टि में काव्य-प्रेरणा का मूल स्रोत <em>&#39;</em>अपर्याप्तता की भावना<em>&#39; </em>के विरुद्ध व्यक्ति का विद्रोह है<em>, </em>जो कला को एक प्रकार का आत्मदान एवं सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ता है। आलेख में सर्जन-प्रक्रिया के अन्तर्गत <em>&#39;</em>तनाव<em>&#39;, &#39;</em>निर्वैयक्तिकता<em>&#39;, &#39;</em>अनुभव की अद्वितीयता<em>&#39;, &#39;</em>अर्थ की साधारणता<em>&#39; </em>तथा <em>&#39;</em>कवि-मानस की ग्रहणशीलता<em>&#39; </em>जैसे तत्त्वों का विस्तृत परीक्षण किया गया है। साधारणीकरण एवं सम्प्रेषण के प्रश्न पर अज्ञेय की मौलिक स्थापनाओं को भारतीय रस-सिद्धान्त एवं पाश्चात्य समीक्षा-परम्परा के सन्दर्भ में रखकर विश्लेषित किया गया है। काव्य-भाषा सम्बन्धी विवेचन में अज्ञेय के उस चिन्तन को उजागर किया गया है जिसमें वे शब्द<em>, </em>मौन<em>, </em>ध्वन्यर्थ एवं रागात्मक सम्बन्ध को काव्य-रचना का अनिवार्य आधार मानते हैं। निष्कर्षतः यह शोध-पत्र यह सिद्ध करता है कि अज्ञेय का प्रयोगवादी काव्य-चिन्तन न तो विशुद्ध कलावाद है और न ही वैयक्तिकता का निषेध<em>, </em>बल्कि वह <em>&#39;</em>व्यक्ति-सत्य<em>&#39; </em>को <em>&#39;</em>समष्टि-सत्य<em>&#39; </em>में रूपान्तरित करने की एक सुचिन्तित एवं मौलिक काव्य-दृष्टि है।</p>

Keywords

प्रयोगवाद, अज्ञेय, सर्जन-प्रक्रिया, निर्वैयक्तिकता, साधारणीकरण, सम्प्रेषणीयता, काव्य-भाषा, मनोविश्लेषण, तनाव-सिद्धान्त, छायावादोत्तर काव्य-चिन्तन