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MRR Journal

Abstract

Indian Journal of Modern Research and Reviews, 2026; 4(6): 207-210

मध्यकालीन समाज एवं सैन्य जीवन में रासो साहित्य एवं महिलाओं की भूमिका

Author Name: प्रेम शंकर पालीवाल

1. असिस्टेंट प्रोफेसर, हिंदी साहित्य अतिथि संकाय, विश्वविद्यालय कन्या महाविद्यालय, बिलौता, राजसमंद मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय, उदयपुर, राजस्थान भारत

Abstract

<p>रासो साहित्य हिंदी साहित्य के आदिकाल की वीरगाथात्मक परंपरा का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण और गौरवपूर्ण अंग है। यह साहित्य केवल युद्ध<em>, </em>वीरता और राजाओं की विजय-गाथाओं का वर्णन मात्र नहीं करता<em>, </em>बल्कि मध्यकालीन भारतीय समाज की सामंतवादी संरचना<em>, </em>सामाजिक मूल्यों<em>, </em>नारी की गरिमा<em>, </em>सैन्य संगठन<em>, </em>स्वामी भक्ति<em>, </em>बलिदान-चेतना तथा सांस्कृतिक मानसिकता का प्रामाणिक और सजीव दस्तावेज भी प्रस्तुत करता है। विशेषतः पृथ्वीराज रासो<em>, </em>बीसलदेव रासो<em>, </em>परमाल रासो तथा हम्मीर रासो जैसे ग्रंथों में तत्कालीन समाज एवं सैन्य जीवन का बहुआयामी चित्रण मिलता है। प्रस्तुत शोध-पत्र में रासो साहित्य की सामाजिक<em>, </em>सांस्कृतिक<em>, </em>ऐतिहासिक एवं सैन्य भूमिका का विस्तृत विश्लेषण किया गया है।प्रस्तुत शोध पत्र मध्यकालीन भारत की &lsquo;रासो काव्य&rsquo; परंपरा के माध्यम से तत्कालीन समाज और सैन्य जीवन का गहन विश्लेषण करता है। रासो साहित्य मात्र चारण-भाटों की काव्यात्मक अभिव्यक्ति नहीं है<em>, </em>बल्कि वह उस युग की सामंती व्यवस्था<em>, </em>क्षत्रिय मूल्यों<em>, </em>युद्ध कौशल और सामाजिक मान्यताओं का एक प्रामाणिक प्रलेख है। शोध का मुख्य उद्देश्य यह सिद्ध करना है कि रासो ग्रंथों ने किस प्रकार जनमानस में &lsquo;शौर्य&rsquo; की संस्कृति को प्रतिस्थापित किया और युद्ध को एक &lsquo;उत्सव&rsquo; के रूप में रूपांतरित किया। शोध में पृथ्वीराज रासो<em>, </em>खम्माण रासो और हम्मीर रासो जैसी कृतियों के साक्ष्यों के माध्यम से सैन्य संगठन<em>, </em>हथियारों के प्रयोग और &lsquo;नमक की मर्यादा&rsquo; के सिद्धांतों को रेखांकित किया गया है। यह पत्र यह निष्कर्ष प्रस्तुत करता है कि रासो साहित्य मध्यकालीन इतिहास-लेखन में एक प्राथमिक सांस्कृतिक और सामरिक स्रोत की भूमिका निभाता है।&nbsp; रासो साहित्य मध्यकालीन भारत का &lsquo;सांस्कृतिक कवच&rsquo; था। इसने समाज को संगठित रखा और सैन्य जीवन को एक ऊँचा आदर्श प्रदान किया। यद्यपि इनमें ऐतिहासिक अतिशयोक्तियाँ मिलती हैं<em>, </em>किंतु उस युग के सामाजिक मनोविज्ञान<em>, </em>शस्त्रास्त्रों की जानकारी और युद्ध नीतियों को समझने के लिए ये ग्रंथ अनिवार्य स्रोत हैं। यह साहित्य आज भी &lsquo;राष्ट्र रक्षा&rsquo; और &lsquo;आत्मसम्मान&rsquo; की प्रेरणा देता है।मध्यकालीन भारतीय इतिहास<em>, </em>विशेषकर राजस्थान का इतिहास<em>, </em>शौर्य और बलिदान की गाथाओं से ओत-प्रोत है। इस कालखंड की सबसे महत्वपूर्ण साहित्यिक निधि &lsquo;रासो साहित्य&rsquo; है। यह साहित्य केवल काव्य नहीं<em>, </em>बल्कि तत्कालीन समाज की मान्यताओं और सैन्य विज्ञान का एक जीवंत दस्तावेज है।&nbsp;&nbsp;</p>

Keywords

रासो साहित्य, मध्यकालीन समाज, सैन्य जीवन, वीरगाथा, पृथ्वीराज रासो, चंदबरदाई।