Abstract
Indian Journal of Modern Research and Reviews, 2026; 4(8): 69-75
सार्वजनिक क्षेत्र (PSUs) के निजीकरण का दलित, पिछड़े और वंचित वर्गों के राजनीतिक/सामाजिक आरक्षण पर प्रभाव
Author Name: डॉ. अशोक कुमार मीना
Abstract
<p>वर्ष 1991 के आर्थिक उदारीकरण<em>, </em>निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG<em>) </em>के दौर के पश्चात् भारत की सामाजिक और आर्थिक नीतियों में बुनियादी बदलाव आए हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs<em>) </em>का रणनीतिक विनिवेश और निजीकरण इस नीतिगत बदलाव का एक मुख्य स्तंभ रहा है। हालांकि<em>, </em>भारतीय संविधान के तहत अनुसूचित जातियों (SC)<em>, </em>अनुसूचित जनजातियों (ST<em>) </em>और अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) को दिए जाने वाले सामाजिक और राजनीतिक आरक्षण का लाभ मुख्य रूप से सरकारी विभागों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों तक ही सीमित है।</p>
<p>प्रस्तुत शोध पत्र का प्राथमिक उद्देश्य यह विश्लेषित करना है कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का निजीकरण किस प्रकार वंचित<em>, </em>पिछड़े और दलित वर्गों के संवैधानिक आरक्षण<em>, </em>आजीविका के अवसरों<em>, </em>सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility)<em> </em>और राजनीतिक सशक्तीकरण को प्रभावित कर रहा है। यह पत्र भारत में सार्वजनिक उपक्रमों की ऐतिहासिक भूमिका<em>, </em>संविधान के अनुच्छेद 16(4)<em> </em>व 16(4A)<em> </em>के तहत सामाजिक न्याय की अवधारणा<em>, </em>निजीकरण के पश्चात् आरक्षित पदों के विलोपन<em>, </em>और निजी क्षेत्र में आरक्षण (Affirmative Action)<em> </em>की मांग जैसे गंभीर आयामों का विस्तृत एवं निष्पक्ष अध्ययन प्रस्तुत करता है। अध्ययन के निष्कर्ष यह दर्शाते हैं कि निजीकरण की तीव्र प्रक्रिया ने औपचारिक क्षेत्र (Formal Sector)<em> </em>में संवैधानिक आरक्षण के दायरे को संकुचित किया है<em>, </em>जिससे सामाजिक विषमता और रोजगार की असुरक्षा बढ़ी है। अंत में<em>, </em>यह शोध पत्र निजी क्षेत्र में सामाजिक उत्तरदायित्व<em>, </em>कौशल विकास और आनुपातिक प्रतिनिधित्व के लिए नीतिगत सिफारिशें प्रस्तुत करता है।</p>
Keywords
सार्वजनिक क्षेत्र (PSUs), निजीकरण, सामाजिक न्याय, आरक्षण, दलित व पिछड़े वर्ग, संवैधानिक संरक्षण, विनिवेश, निजी क्षेत्र में सकारात्मक कार्रवाई।
