प्रस्तुत शोध पत्र महात्मा गांधी के कृषि, कृषक स्वावलंबन तथा समग्र ग्रामीण पुनर्गठन संबंधी दार्शनिक दृष्टिकोण एवं ऐतिहासिक प्रयोगों का आलोचनात्मक मूल्यांकन करता है। गांधी का ग्राम स्वराज केवल राजनीतिक विकेंद्रीकरण का ढांचा नहीं था, बल्कि यह एक पारिस्थिकीय , नैतिक एवं आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था का समन्वित प्रारूप था। आधुनिक औद्योगीकरण और अनियंत्रित नगरीकरण की विभीषिका के बरक्स गांधी ने 'ग्राम केंद्रित अर्थव्यवस्था' की वकालत की, जहाँ कृषि प्राथमिक संबल है तथा कुटीर व खादी उद्योग उसके पूरक। इस पत्र में दक्षिण अफ्रीका के फीनिक्स और टॉलस्टॉय फार्म से लेकर भारत में साबरमती, वर्धा एवं सेवाग्राम आश्रमों में किए गए व्यावहारिक कृषि प्रयोगों, जैविक खाद निर्माण, गोपालन तथा विकेंद्रीकृत ग्रामीण उत्पादन प्रणालियों का विश्लेषण किया गया है। समकालीन कृषि संकट, मृदा क्षरण तथा ग्रामीण पलायन के दौर में गांधीवादी कृषि दर्शन की सतत उपादेयता को भी यहाँ रेखांकित किया गया है।
ग्राम स्वराज, गांधीवादी कृषि, आत्मनिर्भरता, सर्वोदय, खादी एवं ग्रामोद्योग, सेवाग्राम, जैविक कृषि।
डॉ. नीरज कुमार निर्मल. कृषि एवं ग्राम विकास संबंधी गांधी के विचार एवं प्रयोग: एक विश्लेषणात्मक अध्ययन. Indian Journal of Modern Research and Reviews. 2026; 4(10):155-158
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