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Indian Journal of Modern Research and Reviews, 2026; 4(3):118-122

भारतीय समाज में घरेलू हिंसा एक समाजशास्त्रीय अध्ययन

Authors: किरण; डॉ. अनिता पाल;

1. परास्नातक शोधार्थिनी-समाजशास्त्र विभाग, ताराचंद वैदिक पुत्री डिग्री कॉलेज, मुजफ्फरनगर उत्तर प्रदेश, भारत

2. सहायक प्रोफेसर, ताराचंद वैदिक पुत्री डिग्री कॉलेज, मुजफ्फरनगर उत्तर प्रदेश, भारत

Paper Type: Research Paper
Article Information
Received: 2026-01-02   |   Accepted: 2026-02-26   |   Published: 2026-03-12
Abstract

भारतीय समाज में घरेलू हिंसा एक गंभीर सामाजिक समस्या है, जो परिवार और समाज दोनों के लिए हानिकारक है। घरेलू हिंसा का अर्थ है परिवार के किसी सदस्य, विशेषकर महिलाओं, बच्चों या बुजुर्गों के साथ शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक या आर्थिक रूप से किया गया दुर्व्यवहार। भारतीय समाज में यह समस्या लंबे समय से मौजूद है और इसके पीछे कई सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक कारण हैं।

पितृसत्तात्मक व्यवस्था भारतीय समाज की एक प्रमुख विशेषता रही है, जिसमें पुरुषों को अधिक अधिकार और महिलाओं को कम महत्व दिया जाता है। इस असमानता के कारण महिलाओं को कई बार अत्याचार सहना पड़ता है। दहेज प्रथा, अशिक्षा, गरीबी, नशे की लत, बेरोजगारी और सामाजिक रूढ़िवादिता भी घरेलू हिंसा के प्रमुख कारण हैं। कई महिलाएं सामाजिक बदनामी, परिवार टूटने के डर और आर्थिक निर्भरता के कारण हिंसा के खिलाफ आवाज नहीं उठा पाती हैं।

घरेलू हिंसा का प्रभाव केवल पीड़ित व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका असर पूरे परिवार और समाज पर पड़ता है। इससे पीड़ित व्यक्ति में मानसिक तनाव, अवसाद, आत्मविश्वास की कमी और शारीरिक चोटें हो सकती हैं। बच्चों पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिससे उनका मानसिक और भावनात्मक विकास प्रभावित होता है।

भारत सरकार ने इस समस्या को रोकने के लिए कई कानून बनाए हैं, जैसे “घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005”, जो महिलाओं को कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है। इसके अलावा, जागरूकता कार्यक्रम, शिक्षा और महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना भी इस समस्या के समाधान के महत्वपूर्ण उपाय हैं।

अंततः, घरेलू हिंसा को समाप्त करने के लिए समाज में जागरूकता, समानता और सम्मान की भावना को बढ़ावा देना आवश्यक है। जब तक समाज में महिलाओं को समान अधिकार और सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक इस समस्या का पूर्ण समाधान संभव नहीं है।

घरेलू हिंसा के मामलों में केवल शारीरिक हिंसा ही नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक उत्पीड़न भी शामिल होता है। कई बार पीड़ित व्यक्ति को अपमानित करना, धमकी देना, स्वतंत्रता को सीमित करना और आर्थिक रूप से निर्भर बनाए रखना भी घरेलू हिंसा के रूप हैं। यह हिंसा धीरे-धीरे पीड़ित व्यक्ति के आत्मसम्मान और आत्मविश्वास को कमजोर कर देती है, जिससे वह स्वयं को असहाय और कमजोर महसूस करने लगता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में यह समस्या अधिक गंभीर रूप से देखने को मिलती है, क्योंकि वहां शिक्षा और जागरूकता का स्तर अपेक्षाकृत कम होता है। परंतु शहरी क्षेत्रों में भी यह समस्या मौजूद है, हालांकि वहां इसके स्वरूप अलग हो सकते हैं। आधुनिक समाज में भी कई महिलाएं और अन्य पीड़ित व्यक्ति सामाजिक दबाव और परिवार की प्रतिष्ठा के कारण चुप रहते हैं, जिससे यह समस्या और बढ़ जाती है।

घरेलू हिंसा को रोकने के लिए केवल कानून बनाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति की सोच में बदलाव लाना आवश्यक है। परिवार में आपसी सम्मान, समानता और समझदारी को बढ़ावा देना चाहिए। शिक्षा के माध्यम से लोगों को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के बारे में जागरूक करना भी बहुत जरूरी है। महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना और उन्हें आत्मनिर्भर बनाना इस समस्या को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

इसके अतिरिक्त, सामाजिक संगठनों, गैर-सरकारी संस्थाओं और सरकार को मिलकर इस समस्या के समाधान के लिए प्रयास करने चाहिए। जागरूकता अभियान, परामर्श सेवाएं और सहायता केंद्र पीड़ित व्यक्तियों को सहायता प्रदान कर सकते हैं। मीडिया भी इस विषय पर जागरूकता फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

इस प्रकार, घरेलू हिंसा एक गंभीर सामाजिक समस्या है, जिसका समाधान सामूहिक प्रयासों से ही संभव है। समाज में समानता, शिक्षा और जागरूकता के माध्यम से ही इस समस्या को कम किया जा सकता है और एक सुरक्षित तथा सम्मानजनक समाज का निर्माण किया जा सकता है।

घरेलू हिंसा का एक महत्वपूर्ण कारण समाज में व्याप्त लैंगिक असमानता और महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण दृष्टिकोण है। बचपन से ही लड़कों और लड़कियों के बीच भेदभाव किया जाता है, जिससे पुरुषों में श्रेष्ठता की भावना और महिलाओं में हीनता की भावना विकसित हो जाती है। यह असमानता आगे चलकर घरेलू हिंसा के रूप में सामने आती है। इसके अलावा, पारिवारिक तनाव, आर्थिक समस्याएं और संचार की कमी भी घरेलू हिंसा को बढ़ावा देते हैं।

घरेलू हिंसा का प्रभाव केवल शारीरिक चोट तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसका गहरा मानसिक और भावनात्मक प्रभाव भी होता है। पीड़ित व्यक्ति अक्सर भय, चिंता, अवसाद और असुरक्षा की भावना से ग्रस्त हो जाता है। इससे उनका सामाजिक जीवन प्रभावित होता है और वे समाज से अलग-थलग पड़ सकते हैं। कई मामलों में घरेलू हिंसा के कारण आत्महत्या जैसी गंभीर घटनाएं भी सामने आती हैं, जो इस समस्या की गंभीरता को दर्शाती हैं।

घरेलू हिंसा को रोकने के लिए परिवार की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। परिवार के सदस्यों को एक-दूसरे के प्रति सम्मान और सहयोग की भावना रखनी चाहिए। बच्चों को बचपन से ही समानता, सहिष्णुता और अहिंसा के मूल्यों की शिक्षा देना आवश्यक है, ताकि वे भविष्य में जिम्मेदार और संवेदनशील नागरिक बन सकें। शिक्षा संस्थानों में भी इस विषय पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए।

सरकार द्वारा बनाए गए कानूनों के साथ-साथ उनके प्रभावी क्रियान्वयन पर भी ध्यान देना जरूरी है। पुलिस और न्याय प्रणाली को संवेदनशील और उत्तरदायी बनाना चाहिए, ताकि पीड़ित व्यक्तियों को शीघ्र और उचित न्याय मिल सके। साथ ही, हेल्पलाइन सेवाएं, महिला आश्रय गृह और परामर्श केंद्रों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए, जिससे पीड़ित व्यक्तियों को तुरंत सहायता मिल सके। अंततः,घरेलू हिंसा को समाप्त करने के लिए समाज के हर वर्ग को मिलकर प्रयास करना होगा। जब समाज में समानता, सम्मान और न्याय की भावना मजबूत होगी, तभी एक सुरक्षित, स्वस्थ और संतुलित समाज का निर्माण संभव हो सकेगा।

Keywords

घरेलू हिंसा, भारतीय समाज, महिला उत्पीड़न, पारिवारिक संबंध

How to Cite

. भारतीय समाज में घरेलू हिंसा एक समाजशास्त्रीय अध्ययन. Indian Journal of Modern Research and Reviews. 2026; 4(3):118-122

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