प्रस्तुत शोध पत्र भारतीय लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण के ढांचे में महिलाओं की स्थिति और उनकी वास्तविक भूमिका का एक गहन समाजशास्त्रीय विश्लेषण करता है। भारतीय संविधान के 73वें संशोधन ने ग्रामीण स्थानीय निकायों में महिलाओं को आरक्षण प्रदान कर उन्हें सत्ता की मुख्यधारा से जोड़ने का ऐतिहासिक प्रयास किया है। हालांकि, धरातल पर यह सशक्तिकरण अक्सर 'सरपंच पति' जैसी अनौपचारिक अवधारणाओं के कारण बाधित होता पाया गया है।
इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य उन सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों की पहचान करना है, जो निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों को स्वतंत्र निर्णय लेने से रोकते हैं। शोध की कार्यप्रणाली मुख्य रूप से गुणात्मक है, जिसमें प्राथमिक डेटा के रूप में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के साक्षात्कार और द्वितीयक स्रोतों के रूप में सरकारी रिपोर्टों का उपयोग किया गया है।
निष्कर्ष यह दर्शाते हैं कि शिक्षा का अभाव, पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना और घरेलू उत्तरदायित्वों का बोझ महिलाओं को 'नाममात्र का प्रमुख' (Proxy Candidate) बना देता है, जहाँ वास्तविक प्रशासनिक और राजनैतिक शक्ति उनके परिवार के पुरुष सदस्यों (पति, पिता या पुत्र) के पास रहती है। अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि राजनीतिक आरक्षण केवल एक वैधानिक उपकरण है; वास्तविक सशक्तिकरण के लिए सामाजिक मानसिकता में परिवर्तन और संस्थागत सहयोग अनिवार्य है। जब तक 'सरपंच पति' जैसी व्यवस्था का सामाजिक बहिष्कार नहीं होगा, तब तक महिलाओं की भागीदारी 'प्रतीकात्मक' ही बनी रहेगी।
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. पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी: वास्तविक सशक्तिकरण बनाम 'सरपंच पति' की अवधारणा का समाजशास्त्रीय अध्ययन. Indian Journal of Modern Research and Reviews. 2026; 4(3):257-265
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