समकालीन समाज में लैंगिकता और यौनिक पहचान से जुड़े मुद्दों पर व्यापक चर्चा हो रही है। विशेष रूप से समलैंगिकता के विषय ने सामाजिक, सांस्कृतिक और कानूनी स्तर पर महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया है। लंबे समय तक भारतीय समाज में समलैंगिकता को सामाजिक मान्यताओं के विरुद्ध समझा जाता रहा और इसे सार्वजनिक चर्चा से बाहर रखा गया। परिणामस्वरूप समलैंगिक व्यक्तियों को सामाजिक अस्वीकृति, भेदभाव और मानसिक दबाव का सामना करना पड़ा।
हालांकि पिछले कुछ वर्षों में सामाजिक परिवर्तनों, शिक्षा के प्रसार, मीडिया के प्रभाव और न्यायिक निर्णयों के कारण समाज में इस विषय के प्रति दृष्टिकोण में परिवर्तन दिखाई देने लगा है। विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में समलैंगिकता से संबंधित चर्चाएँ अपेक्षाकृत अधिक खुलकर सामने आने लगी हैं। वहीं दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक मान्यताओं का प्रभाव अधिक होने के कारण इस विषय के प्रति दृष्टिकोण अपेक्षाकृत रूढ़िवादी दिखाई देता है।
प्रस्तुत अध्ययन का मुख्य उद्देश्य शहरी और ग्रामीण समाज में समलैंगिकता के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण का तुलनात्मक अध्ययन करना है। इस शोध के माध्यम से यह समझने का प्रयास किया गया है कि दोनों सामाजिक परिवेशों में समलैंगिकता को किस प्रकार देखा और समझा जाता है तथा इन दृष्टिकोणों को प्रभावित करने वाले सामाजिक और सांस्कृतिक कारक कौन-कौन से हैं।
यह अध्ययन इस बात को भी स्पष्ट करता है कि आधुनिक शिक्षा, मीडिया और शहरी जीवन शैली के कारण शहरी समाज में समलैंगिकता के प्रति अपेक्षाकृत अधिक सहिष्णुता देखने को मिलती है, जबकि ग्रामीण समाज में पारंपरिक मान्यताओं के कारण अभी भी इस विषय को सामाजिक स्वीकृति प्राप्त करने में अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इस प्रकार यह अध्ययन समलैंगिकता के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण में मौजूद भिन्नताओं को समझने का एक महत्वपूर्ण प्रयास है।
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. शहरी और ग्रामीण समाज में समलैंगिकता के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण का तुलनात्मक अध्ययन. Indian Journal of Modern Research and Reviews. 2026; 4(3):369-374
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