प्रस्तुत शोध पत्र स्वतंत्रता के पश्चात से वर्तमान समय तक भारतीय विदेश नीति के क्रमिक विकास का एक गहन ऐतिहासिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इस अध्ययन का मुख्य केंद्र बिंदु यह समझना है कि कैसे भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों के संरक्षण के लिए विभिन्न कालखंडों में 'निरंतरता' और 'परिवर्तन' के बीच एक कूटनीतिक संतुलन बनाए रखा है। शोध पत्र के प्रथम चरण में नेहरूवादी युग के आदर्शवाद, गुटनिरपेक्षता और पंचशील के सिद्धांतों की विवेचना की गई है, जो दशकों तक भारतीय विदेश नीति का आधार रहे। द्वितीय चरण में शीतयुद्ध के समीकरणों, क्षेत्रीय युद्धों और 1991 के आर्थिक उदारीकरण के बाद आए यथार्थवादी बदलावों का अध्ययन किया गया है।
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, यह शोध पत्र भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता', 'एक्ट ईस्ट' नीति, और 'ग्लोबल साउथ' के नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरती भूमिका पर प्रकाश डालता है। विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि जहाँ भारत ने अपने मूल शांतिवादी सिद्धांतों को निरंतर रखा है, वहीं बदलती वैश्विक भू-राजनीति के उत्तर में अपनी कूटनीति को अधिक मुखर और सक्रिय बनाया है। अंततः, यह शोध पत्र यह निष्कर्ष निकालता है कि भारतीय विदेश नीति का समकालीन स्वरूप 'राष्ट्रीय हित सर्वोपरि' के सिद्धांत पर आधारित है, जो इसे एक उत्तरदायी और सशक्त वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करता है।
भारतीय विदेश नीति, राष्ट्रीय हित, कूटनीति, गुटनिरपेक्ष आंदोलन, सामरिक स्वायत्तता, वैश्विक दक्षिण, भू-राजनीति।
. भारतीय विदेश नीति में निरंतरता और परिवर्तन : राष्ट्रीय हितों के संरक्षण हेतु कूटनीतिक प्रयासों का ऐतिहासिक सर्वेक्षण (1947-2026). Indian Journal of Modern Research and Reviews. 2026; 4(4):78-88
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