मध्यकालीन उत्तर भारत मुस्लिम आक्रमणकारियो के लगातार आक्रमण से उद्वेलित हो उठा था। ठीक इसी समय दक्षिण भारत मे उसके मूल ब्रम्ह की नव्य व्याख्या करने के प्रयत्न चल रहे थे। बौद्ध धर्म के पतन के पश्चात आठवी शताब्दी मे शंकराचार्य ने वैदिक धर्म की पुनः स्थापना की और अद्वेतवाद का प्रचार किया। सैद्धांतिक दृष्टि से शंकराचार्य के एकेत्ववाद मे संकीर्णता का अभाव है और समाज को एकता के सूत्र मे बांध देने की शक्ति है। परंतु देखा जाए तो व्यावहारिक दृष्टि से वह सफल न हो सका। इसके पश्चात शंकराचार्य के अद्वैतवाद को आधार मानकर आगे दक्षिण मे चार मुख्य मतो की स्थापना हुई। रामानुजाचार्य का विशिष्टद्वैतवाद, निम्बार्क का द्वैताद्वैतवाद, विष्णुस्वामी शुद्धाद्वैतवाद और मध्वाचार्य का द्वैतवाद। यह दार्शनिक वाद परस्पर भिन्न होते हुए भी मूलरुप मे एक दुसरे के पुरक थे और यह धार्मिक एवम दार्शनिक व्याख्याए किसी न किसी रुप मे समग्र भारत मे फैली हुई थी। देखा जाए तो पुरे भारत मे भक्ति आंदोलन को जन्म देने का श्रेय इन दार्शनिको को ही है। इतिहास इस बात का गवाह है कि दक्षिण भारत की यह धार्मिक आंदोलन अपनी मूल चेतना मे अखिल भारतीय सांस्कृतिक नव-चेतना का ही नया रुप था. दक्षिण भारत के इन जनवादी धार्मिक आंदोलन ने विभिन्न धर्मो, मतो, सम्प्रदायो मे विभाजित सम्पूर्ण भारतीय जनता को पुनरू एकसूत्र मे बांधने का काम किया।
वेद, सम्प्रदाय, संस्कृति, दर्शन, विभिन्न विद्वान, वाद आदि
. Secularism and Life Values in the Poetry of Sant Kabir संत कबीर के काव्य में धर्मनिरपेक्षता और जीवन मूल्य. Indian Journal of Modern Research and Reviews. 2024; 2(9):04-07
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