समकालीन भारतीय समाज में जाति व्यवस्था को अक्सर परिवर्तनशील माना जाता है, जहाँ संस्कृतिकरण को सामाजिक उन्नयन के एक प्रमुख साधन के रूप में देखा गया है। एम. एन. श्रीनिवास के अनुसार, निम्न जातियाँ उच्च जातियों की जीवनशैली, रीति-रिवाजों और मूल्यों को अपनाकर अपनी सामाजिक स्थिति में सुधार का प्रयास करती हैं। पहली दृष्टि में यह प्रक्रिया सामाजिक गतिशीलता और परिवर्तन का संकेत देती है। हालाँकि, यह अध्ययन इस धारणा को सतही मानते हुए एक आलोचनात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। यहाँ तर्क यह है कि संस्कृतिकरण के माध्यम से होने वाला परिवर्तन अधिकतर प्रतीकात्मक होता है, जबकि सामाजिक संरचना में निहित असमानताएँ यथावत बनी रहती हैं। इस संदर्भ में पियरे बॉर्डियू के सांस्कृतिक पुनरुत्पादन के सिद्धांत के आधार पर यह समझने का प्रयास किया गया है कि किस प्रकार सांस्कृतिक प्रक्रियाएँ स्वयं असमानता को बनाए रखने का कार्य करती हैं। द्वितीयक स्रोतों पर आधारित यह अध्ययन निष्कर्ष निकालता है कि संस्कृतिकरण, परिवर्तन का आभास तो उत्पन्न करता है, परंतु वास्तव में यह सामाजिक असमानता के पुनरुत्पादन की प्रक्रिया को ही मजबूत करता है। इस प्रकार, यह शोधपत्र जातिगत परिवर्तन के विमर्श को एक नए, आलोचनात्मक परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करने का प्रयास करता है।
संस्कृतिकरण, जातिगत परिवर्तन, सामाजिक असमानता, सांस्कृतिक पुनरुत्पादन, सामाजिक गतिशीलता
डॉ. शैलेन्द्र कुमार पाण्डेय. संस्कृतिकरण और जातिगत परिवर्तन: समकालीन भारतीय समाज में सामाजिक असमानता के पुनरुत्पादन का समाजशास्त्रीय विश्लेषण. Indian Journal of Modern Research and Reviews. 2026; 4(5):54-60
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