प्रस्तुत अध्ययन राजस्थान में ग्रामीण विकास में नाबार्ड (राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक) की भूमिका का विश्लेषण करता है, जिसमें कृषि ऋण प्रवाह, स्वयं सहायता समूह (एसएचजी) संयोजन और संस्थागत ऋण प्रदर्शन पर विशेष ध्यान दिया गया है। अध्ययन के मुख्य उद्देश्य राजस्थान की ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर नाबार्ड के प्रभाव का आकलन करना तथा कृषि एवं ग्रामीण विकास हेतु ऋण सहायता विस्तार में आने वाली चुनौतियों और संभावनाओं का अध्ययन करना है। वर्ष 2011 से 2025 तक के जिलावार संचयी आंकड़ों के आधार पर ग्यारह प्रमुख जिलों में ऋण वितरण, वसूली दर, एनपीए अनुपात और एसएचजी संयोजन का तुलनात्मक मूल्यांकन किया गया है। अध्ययन के निष्कर्ष क्षेत्रीय असमानताओं को स्पष्ट रूप से उजागर करते हैं — जयपुर ₹3,850 करोड़ के ऋण वितरण और 92% वसूली दर के साथ अग्रणी जिले के रूप में उभरा है, जबकि बाड़मेर और बीकानेर में अपेक्षाकृत कम वसूली दर और उच्च एनपीए स्तर कृषि-जलवायु संवेदनशीलता और सामाजिक-आर्थिक कमज़ोरियों को प्रतिबिंबित करते हैं। अध्ययन में कृषि ऋण पोर्टफोलियो में उच्च गैर-निष्पादित आस्तियाँ, आदिवासी क्षेत्रों में सीमित बैंकिंग अवसंरचना तथा बटाईदार किसानों का औपचारिक ऋण प्रणाली से बहिष्कार जैसी प्रमुख बाधाओं की पहचान की गई है। अध्ययन इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि केवल ऋण उपलब्धता सतत ग्रामीण विकास के लिए पर्याप्त नहीं है; इसके साथ फसल बीमा, जोखिम प्रबंधन तंत्र, डिजिटल वित्तीय सेवाओं और आजीविका विविधीकरण का एकीकरण अनिवार्य है। अध्ययन में क्षेत्र-विशिष्ट ऋण नियोजन, संस्थागत क्षमता सुदृढ़ीकरण और वित्तीय साक्षरता कार्यक्रमों के विस्तार की सिफारिश की गई है, ताकि राजस्थान में नाबार्ड के पुनर्वित्त कार्यों का विकासात्मक प्रभाव अधिकतम हो सके।
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डॉ. कांता चौधरी, मंजू कंवर. राजस्थान में ग्रामीण विकास में नाबार्ड की भूमिका का अध्ययन. Indian Journal of Modern Research and Reviews. 2025; 3(11):102-106
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