यह शोध-पत्र हिंदी साहित्य-समीक्षा में स्वच्छंदतावादी काव्य-चिंतन का विश्लेषण करता है, जिसमें मुख्य रूप से दो प्रमुख समीक्षक-चिंतकों — आचार्य नंददुलारे वाजपेयी और डॉ. नगेंद्र — के काव्यशास्त्रीय अवदान को केंद्र में रखा गया है। यह आलेख यह स्थापित करता है कि छायावादी कवि-समीक्षकों ने पाश्चात्य स्वच्छंदतावाद से प्रेरणा ग्रहण करते हुए भी अपनी भारतीय ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक जड़ों से स्वयं को कभी विच्छिन्न नहीं किया। आलेख में वाजपेयी जी की उस आलोचना-दृष्टि का विवेचन किया गया है जिसमें उन्होंने आचार्य रामचंद्र शुक्ल के 'लोकधर्म' सिद्धांत की सीमाओं, उनके व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों तथा आधुनिक साहित्यिक प्रवृत्तियों के प्रति उनकी उदासीनता को रेखांकित किया। साथ ही यह भी दिखाया गया है कि वाजपेयी जी ने भारतीय रस-सिद्धांत एवं वर्ड्सवर्थ-कॉलरिज की स्वच्छंदतावादी सौंदर्यदृष्टि के समन्वय से एक नई काव्य-समीक्षा-भूमि का निर्माण किया। इसके अतिरिक्त, डॉ. नगेंद्र के उस समन्वयवादी चिंतन का परीक्षण किया गया है जिसमें उन्होंने भारतीय रसशास्त्र तथा पाश्चात्य समीक्षा-परंपराओं — रिचर्ड्स, क्रोचे, अरस्तू — के मध्य साम्य-भूमि की खोज करते हुए रस को सार्वकालिक एवं सार्वभौम काव्य-मूल्य के रूप में प्रतिष्ठित किया तथा रसानुभूति को अनिवार्यतः आनंदमयी चेतना माना। दोनों समीक्षकों ने मार्क्सवादी एवं मनोविश्लेषणवादी दृष्टियों को अस्वीकार करते हुए मानवतावादी एवं भावात्मक साहित्य-दृष्टि का पक्ष लिया। निष्कर्षतः यह शोध-पत्र यह सिद्ध करता है कि हिंदी का स्वच्छंदतावादी काव्य-चिंतन एक विशिष्ट, सांस्कृतिक रूप से सजग बौद्धिक आंदोलन है जिसने परंपरा और आधुनिकता तथा प्राच्य और पाश्चात्य के मध्य सेतु का कार्य किया।
स्वच्छंदतावाद, छायावाद, रस-सिद्धांत, हिंदी काव्य-समीक्षा, नंददुलारे वाजपेयी, डॉ. नगेंद्र, लोकधर्म, सौंदर्यानुभूति, भारतीय काव्यशास्त्र, तुलनात्मक काव्यशास्त्र
प्रो दीपक प्रकाश त्यागी. स्वच्छन्दतावादी काव्य चिन्तन:स्वरूप और वैशिष्ट्य. Indian Journal of Modern Research and Reviews. 2025; 3(8):59-67
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