यह शोध-पत्र छायावादोत्तर हिन्दी काव्य-चिन्तन में प्रयोगवादी काव्यदृष्टि की प्रकृति एवं परिवेश का विश्लेषण करता है, जिसमें अज्ञेय के काव्य-चिन्तन को केन्द्रीय आधार के रूप में स्वीकार किया गया है। यह आलेख स्थापित करता है कि अज्ञेय ने छायावादी काव्य-परम्परा के पश्चात् हिन्दी काव्य-चिन्तन को एक सर्वथा नवीन दिशा प्रदान की, जिसमें पाश्चात्य मनोविश्लेषण-शास्त्र — विशेषतः फ्रायड, एडलर एवं युंग — तथा इलियट के सृजन-सिद्धान्त का गहरा प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। शोध-पत्र में यह विवेचन किया गया है कि अज्ञेय की दृष्टि में काव्य-प्रेरणा का मूल स्रोत 'अपर्याप्तता की भावना' के विरुद्ध व्यक्ति का विद्रोह है, जो कला को एक प्रकार का आत्मदान एवं सामाजिक उत्तरदायित्व से जोड़ता है। आलेख में सर्जन-प्रक्रिया के अन्तर्गत 'तनाव', 'निर्वैयक्तिकता', 'अनुभव की अद्वितीयता', 'अर्थ की साधारणता' तथा 'कवि-मानस की ग्रहणशीलता' जैसे तत्त्वों का विस्तृत परीक्षण किया गया है। साधारणीकरण एवं सम्प्रेषण के प्रश्न पर अज्ञेय की मौलिक स्थापनाओं को भारतीय रस-सिद्धान्त एवं पाश्चात्य समीक्षा-परम्परा के सन्दर्भ में रखकर विश्लेषित किया गया है। काव्य-भाषा सम्बन्धी विवेचन में अज्ञेय के उस चिन्तन को उजागर किया गया है जिसमें वे शब्द, मौन, ध्वन्यर्थ एवं रागात्मक सम्बन्ध को काव्य-रचना का अनिवार्य आधार मानते हैं। निष्कर्षतः यह शोध-पत्र यह सिद्ध करता है कि अज्ञेय का प्रयोगवादी काव्य-चिन्तन न तो विशुद्ध कलावाद है और न ही वैयक्तिकता का निषेध, बल्कि वह 'व्यक्ति-सत्य' को 'समष्टि-सत्य' में रूपान्तरित करने की एक सुचिन्तित एवं मौलिक काव्य-दृष्टि है।
प्रयोगवाद, अज्ञेय, सर्जन-प्रक्रिया, निर्वैयक्तिकता, साधारणीकरण, सम्प्रेषणीयता, काव्य-भाषा, मनोविश्लेषण, तनाव-सिद्धान्त, छायावादोत्तर काव्य-चिन्तन
. प्रयोगवादी काव्य चिन्तन: प्रकृति और परिवेश. Indian Journal of Modern Research and Reviews. 2025; 3(11):116-124
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