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Indian Journal of Modern Research and Reviews, 2026; 4(4):274-287

भारतीय संस्कृति के वैश्विक प्रतीक : भगवान श्रीराम एवं रामायण

Authors: डॉ. रवि कुमार; डॉ. धरवेश कठेरिया;

1. सहायक प्रोफेसर, भाषा विद्यापीठ, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र, भारत

2. एसोसिएट प्रोफेसर, जनसंचार विभाग, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा, महाराष्ट्र, भारत

Paper Type: Research Paper
Article Information
Received: 2026-03-07   |   Accepted: 2026-04-27   |   Published: 2026-04-30
Abstract

प्रस्तुत शोध आलेख "भारतीय संस्कृति के वैश्विक प्रतीक : भगवान श्रीराम एवं रामायण" भारतीय संस्कृति के अंतरराष्ट्रीय विस्तार तथा भगवान श्रीराम एवं रामायण की वैश्विक उपस्थिति का ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक एवं तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करता है। अध्ययन का मुख्य उद्देश्य यह विश्लेषण करना है कि भारतीय सभ्यता के इन महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक प्रतीकों ने भारत की भौगोलिक सीमाओं से बाहर विभिन्न देशों की सांस्कृतिक परंपराओं, साहित्य, कला, स्थापत्य तथा लोकजीवन को किस प्रकार प्रभावित किया। शोध में नेपाल, श्रीलंका, इंडोनेशिया, कंबोडिया, थाईलैंड, म्यांमार, लाओस, मलेशिया तथा अन्य संबंधित क्षेत्रों में विकसित रामायण परंपराओं का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है।

यह अध्ययन वर्णनात्मक, विश्लेषणात्मक, तुलनात्मक एवं ऐतिहासिक शोध दृष्टिकोणों पर आधारित है। शोध में वाल्मीकि रामायण सहित विभिन्न क्षेत्रीय रामायणों, ऐतिहासिक एवं पुरातात्त्विक साक्ष्यों, साहित्यिक कृतियों तथा प्रतिष्ठित विद्वानों के अध्ययनों का समन्वित उपयोग किया गया है। अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि भगवान श्रीराम एवं रामायण का वैश्विक प्रसार किसी राजनीतिक या सैन्य विस्तार का परिणाम नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक संवाद, व्यापारिक संपर्क, धार्मिक एवं बौद्धिक आदान-प्रदान तथा स्थानीय समाजों द्वारा भारतीय सांस्कृतिक मूल्यों के स्वैच्छिक आत्मसात की दीर्घकालिक प्रक्रिया का परिणाम था।

शोध के निष्कर्ष यह संकेत करते हैं कि विभिन्न देशों में रामायण के अनेक स्थानीय स्वरूप विकसित होने के बावजूद उसके मूल जीवन-मूल्य—सत्य, मर्यादा, न्याय, कर्तव्य, करुणा तथा लोककल्याण—सर्वत्र सुरक्षित रहे। यही सार्वभौमिक मूल्य भगवान श्रीराम एवं रामायण को भारतीय संस्कृति के ऐसे वैश्विक प्रतीक के रूप में स्थापित करते हैं, जो आज भी सांस्कृतिक कूटनीति, अंतरराष्ट्रीय शोध, सांस्कृतिक विरासत संरक्षण तथा वैश्विक सांस्कृतिक संवाद में समान रूप से प्रासंगिक हैं। प्रस्तुत अध्ययन भारतीय संस्कृति के वैश्विक आयामों को समझने की दिशा में एक प्रमाण-आधारित एवं तुलनात्मक अकादमिक योगदान प्रस्तुत करता है।

Keywords

भगवान श्रीराम, रामायण, भारतीय संस्कृति, वैश्विक संस्कृति, सांस्कृतिक प्रसार, सांस्कृतिक कूटनीति, दक्षिण-पूर्व एशिया, तुलनात्मक अध्ययन, रामाकियन, रीमकेर, काकाविन रामायण, वैश्विक विरासत, सभ्यतागत संवाद, सांस्कृतिक संपर्क, भारतीय सभ्यता

How to Cite

डॉ. रवि कुमार, डॉ. धरवेश कठेरिया. भारतीय संस्कृति के वैश्विक प्रतीक : भगवान श्रीराम एवं रामायण. Indian Journal of Modern Research and Reviews. 2026; 4(4):274-287

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