वर्ष 1991 के आर्थिक उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) के दौर के पश्चात् भारत की सामाजिक और आर्थिक नीतियों में बुनियादी बदलाव आए हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (PSUs) का रणनीतिक विनिवेश और निजीकरण इस नीतिगत बदलाव का एक मुख्य स्तंभ रहा है। हालांकि, भारतीय संविधान के तहत अनुसूचित जातियों (SC), अनुसूचित जनजातियों (ST) और अन्य पिछड़े वर्गों (OBC) को दिए जाने वाले सामाजिक और राजनीतिक आरक्षण का लाभ मुख्य रूप से सरकारी विभागों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों तक ही सीमित है।
प्रस्तुत शोध पत्र का प्राथमिक उद्देश्य यह विश्लेषित करना है कि सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का निजीकरण किस प्रकार वंचित, पिछड़े और दलित वर्गों के संवैधानिक आरक्षण, आजीविका के अवसरों, सामाजिक गतिशीलता (Social Mobility) और राजनीतिक सशक्तीकरण को प्रभावित कर रहा है। यह पत्र भारत में सार्वजनिक उपक्रमों की ऐतिहासिक भूमिका, संविधान के अनुच्छेद 16(4) व 16(4A) के तहत सामाजिक न्याय की अवधारणा, निजीकरण के पश्चात् आरक्षित पदों के विलोपन, और निजी क्षेत्र में आरक्षण (Affirmative Action) की मांग जैसे गंभीर आयामों का विस्तृत एवं निष्पक्ष अध्ययन प्रस्तुत करता है। अध्ययन के निष्कर्ष यह दर्शाते हैं कि निजीकरण की तीव्र प्रक्रिया ने औपचारिक क्षेत्र (Formal Sector) में संवैधानिक आरक्षण के दायरे को संकुचित किया है, जिससे सामाजिक विषमता और रोजगार की असुरक्षा बढ़ी है। अंत में, यह शोध पत्र निजी क्षेत्र में सामाजिक उत्तरदायित्व, कौशल विकास और आनुपातिक प्रतिनिधित्व के लिए नीतिगत सिफारिशें प्रस्तुत करता है।
सार्वजनिक क्षेत्र (PSUs), निजीकरण, सामाजिक न्याय, आरक्षण, दलित व पिछड़े वर्ग, संवैधानिक संरक्षण, विनिवेश, निजी क्षेत्र में सकारात्मक कार्रवाई।
. सार्वजनिक क्षेत्र (PSUs) के निजीकरण का दलित, पिछड़े और वंचित वर्गों के राजनीतिक/सामाजिक आरक्षण पर प्रभाव. Indian Journal of Modern Research and Reviews. 2026; 4(8):69-75
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