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Indian Journal of Modern Research and Reviews, 2026; 4(SP1):228-233

संवेदना से नैतिक चेतना तकः डॉ. पद्मजा शर्मा स्त्री-दृष्टि का आलोचनात्मक अध्ययन

Authors: ललिता डाबी;

1. शोधार्थी, जयनारायण व्यास विश्व विद्यालय, जोधपुर, राजस्थान, भारत

Paper Type: Research Paper
Article Information
Received: 2026-03-01   |   Accepted: 2026-06-06   |   Published: 2026-07-17
Abstract

समकालीन हिन्दी साहित्य में गद्य-विधाओं का विस्तार मात्र शिल्पगत प्रयोग नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना, नैतिक विवेक और मानवीय संवेदना के सघन संवाद का माध्यम है। इस संदर्भ में डॉ. प‌द्मजा शर्मा का गद्य-साहित्य एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में उभरता है, जो कविता और कथा की सीमाओं को पार करते हुए निबंध, संस्मरण, समीक्षा, यात्रा वृत्तांत, साक्षात्कार और सामाजिक सांस्कृतिक लेखन के माध्यम से जीवन की बहुस्तरीय वास्तविकताओं को उद्घाटित करता है। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य डॉ.पद्मजा शर्मा के गद्य-लेखन में निहित संवेदना की प्रकृति, उसकी सामाजिक भूमिका तथा स्त्री-दृष्टि के वैचारिक विस्तार का गहन विश्लेषण करना है, विशेषतः उस संवेदना के आलोक में जो भावुकता नहीं, बल्कि नैतिक चेतना का रूप ग्रहण करती है।

अध्ययन का आधार डॉ. प‌द्मजा शर्मा की रचनाओं के उस वैचारिक ताने-बाने को बनाया गया है, जहाँ गद्य साहित्य केवल सौंदर्य बोध का साधन न होकर सामाजिक यथार्थ, स्त्री अनुभव, सांस्कृतिक स्मृति और मानवीय मूल्यों का सशक्त वाहक बनता है। उनके निबंधों में सामाजिक विषमताएँ, स्त्री-जीवन की जटिलताएँ और शिक्षा संस्कृति से जुड़े प्रश्न विवेकपूर्ण तर्क के साथ उपस्थित होते हैं। संस्मरणात्मक गद्य में आत्मीयता और अनुभवजन्य सत्य का ऐसा संतुलन दिखाई देता है,जो पाठक को व्यक्तिगत अनुभूति से सामाजिक सन्दर्भ तक ले जाता है। इसी प्रकार उनकी समीक्षाएँ और आलोचनात्मक लेखन रचनात्मक निष्पक्षता, संवेदनशील दृष्टि और वैचारिक परिपक्वता का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।

इस शोध में यह तर्क स्थापित किया गया है कि डॉ. पद्मजा शर्मा की संवेदना करुणा या सहानुभूति तक सीमित न रहकर प्रतिरोध, प्रश्नाकुलता और नैतिक हस्तक्षेप का स्वर धारण करती है। उनका गद्य स्त्री को केवल पीड़िता के रूप में नहीं, बल्कि संघर्षशील, विवेकशील और आत्मसम्मान से युक्त व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत करता है। साथ ही, प्रकृति, लोक संस्कृति और मानवीय संबंधों के प्रति उनकी दृष्टि गय को व्यापक सामाजिक सरोकारों से जोड़ती है।

निष्कर्षतः यह शोध-पत्र यह प्रतिपादित करता है कि डॉ. पद्मजा शर्मा का गद्य-साहित्य हिन्दी गद्य परंपरा में एक महत्वपूर्ण नैतिक और वैचारिक विस्तार है, जो साहित्य को सामाजिक परिवर्तन की चेतना से जोड़ता है और पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करता है। इस दृष्टि से उनका गद्य न केवल साहित्यिक रूप से प्रासंगिक है, बल्कि समकालीन समाज के लिए भी दिशासूचक सिद्ध होता है।

Keywords

संवेदना, नैतिक चेतना, गद्य-विधाएँ, स्त्री-दृष्टि, सामाजिक सरोकार

How to Cite

. संवेदना से नैतिक चेतना तकः डॉ. पद्मजा शर्मा स्त्री-दृष्टि का आलोचनात्मक अध्ययन. Indian Journal of Modern Research and Reviews. 2026; 4(SP1):228-233

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