प्रस्तुत शोध पत्र वर्ष 1991 के आर्थिक उदारीकरण एवं वैश्वीकरण के पश्चात् अंतरराष्ट्रीय पटल पर भारतीय प्रवासियों, विशेष रूप से अनिवासी भारतीय (एनआरआई) तथा भारतीय मूल के व्यक्तियों (पीआईओ) की बदलती सामाजिक, आर्थिक एवं रणनीतिक भूमिका का सर्वांगीण परीक्षण करता है। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में 'प्रतिभा पलायन' (Brain Drain) के रूप में देखे जाने वाले भारतीय प्रवासन को वैश्वीकरण ने 'प्रतिभा लाभ' (Brain Gain) और 'राष्ट्रीय शक्ति संवर्धन' की धुरी में रूपांतरित कर दिया है। यह शोध पत्र वैश्विक अर्थव्यवस्था में प्रेषित धन, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, उद्यमशीलता, नवोन्मेष और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण में प्रवासी भारतीयों के आर्थिक अवदान का सांख्यिकीय एवं गुणात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।
साथ ही, अंतरराष्ट्रीय संबंधों, भू-राजनीतिक लॉबिंग, कूटनीतिक वार्ताओं, सॉफ्ट पावर विस्तार तथा घरेलू चुनावी राजनीति में प्रवासी प्रभाव का आलोचनात्मक मूल्यांकन करता है। अध्ययन के निष्कर्ष यह स्पष्ट करते हैं कि भारतीय डायस्पोरा अब मात्र एक बाह्य दर्शक नहीं, बल्कि भारत के आर्थिक पुनरुत्थान, नीति निर्माण और वैश्विक रणनीतिक सशक्तिकरण का एक अपरिहार्य एवं सक्रिय भागीदार बन चुका है।
वैश्वीकरण, अनिवासी भारतीय (एनआरआई), प्रवासी भारतीय, प्रेषित धन (रेमिटेंस), आर्थिक विकास, प्रवासी कूटनीति, लॉबिंग, सॉफ्ट पावर।
डॉ. अशोक कुमार मीना. वैश्वीकरण के उपरांत अनिवासी भारतीय (एन.आर.आई.) समुदाय की बहुआयामी राजनीतिक एवं आर्थिक भूमिका: एक समकालीन विश्लेषणात्मक अध्ययन. Indian Journal of Modern Research and Reviews. 2026; 4(8):266-271
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