भारत एक बहुभाषी राष्ट्र है, जहाँ अनेकता में एकता उसकी सांस्कृतिक विशेषता है। यह आलेख भारतीय भाषाओं और राष्ट्रीय एकता के परस्पर संबंध का विश्लेषण करता है। लेखिका ने बताया है कि भाषा केवल संप्रेषण का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और सामाजिक मूल्यों की वाहक भी होती है। आलेख में अंग्रेजों द्वारा प्रस्तुत की गई भाषा-परिवार की मिथ्या अवधारणा तथा 'आर्य-द्रविड़' सिद्धांत की समीक्षा करते हुए यह प्रतिपादित किया गया है कि भारत की समस्त भाषाएँ एक ही सांस्कृतिक धारा की शाखाएँ हैं। संस्कृत को भारतीय भाषाओं की जननी और राष्ट्रीय-सांस्कृतिक एकता की आधारशिला के रूप में प्रस्तुत किया गया है। साथ ही पी. बी. पंडित के विचारों के माध्यम से भारतीय समाज की भाषा-अनुरक्षण की प्रवृत्ति को पाश्चात्य भाषा-विस्थापन की प्रवृत्ति से भिन्न बताया गया है। आलेख के अंत में यह निष्कर्ष निकाला गया है कि भाषिक विविधता के बावजूद भारत की सांस्कृतिक एकता व अखंडता अक्षुण्ण है और राष्ट्रीय एकता हेतु संतुलित भाषा-नीति तथा व्यापक राष्ट्रवादी दृष्टिकोण आवश्यक है।
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डॉ. सुजाता मगदुम. भारतीय भाषाएँ और राष्ट्रीय एकता. Indian Journal of Modern Research and Reviews. 2025; 3(4):81-83
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