प्रस्तुत आलेख संत कबीरदास के काव्य की सांस्कृतिक प्रासंगिकता का विवेचन करता है। भारतवर्ष की भाषिक एवं सांस्कृतिक विविधता के बावजूद उसमें अंतर्निहित एकसूत्रता को रेखांकित करते हुए लेखिका बताती हैं कि कबीर इस एकता-चेतना के प्रमुख वाहक रहे हैं। निर्गुणवादी, निराकार ब्रह्म के उपासक होते हुए भी कबीर की दृष्टि अन्य भक्त कवियों की अपेक्षा अधिक समाजोन्मुखी थी, जिसके कारण उनके विचार धर्म, अध्यात्म, समाज, राजनीति और साहित्य—सभी दृष्टियों से आज भी प्रासंगिक हैं। आलेख में कबीर के भक्ति-भाव, बाह्याडंबर व पाखंड के विरोध, धन-संचय तथा अमीर-गरीब भेद की आलोचना, तथा हिन्दू-मुस्लिम धार्मिक समन्वय संबंधी विचारों का विश्लेषण उनके पदों के उद्धरणों सहित किया गया है। साथ ही कबीर की निर्भीक वाणी, सहज लोकभाषा-प्रयोग और आत्मशक्ति-संपन्न साहित्य-सृजन को वर्तमान साहित्यकारों के लिए अनुकरणीय आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया गया है। निष्कर्षतः लेखिका यह प्रतिपादित करती हैं कि समाज में आज भी विद्यमान धार्मिक भिन्नता, वर्गभेद और बाह्याचार जैसी विकृतियों के परिप्रेक्ष्य में कबीर की वाणी और भी अधिक सार्थक तथा ज्वलंत प्रासंगिकता रखती है।
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डॉ. सुजाता मगदुम. कबीर काव्य की सांस्कृतिक प्रासंगिकता. Indian Journal of Modern Research and Reviews. 2025; 3(1):54-56
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