स्वामी विवेकानन्द के अनुसार कर्मयोग केवल कर्म करने का नाम नहीं है, बल्कि निःस्वार्थ भाव से कर्तव्य का पालन करना और मानव सेवा को ईश्वर की सेवा मानना है। उनका मानना था कि प्रत्येक मनुष्य के भीतर अपार शक्ति विद्यमान है। आवश्यकता है कि व्यक्ति अपने आत्मविश्वास और शक्ति को पहचानकर उसका सही उपयोग करे।
स्वामी जी ने मनुष्य को कर्मठ, साहसी, आत्मनिर्भर और चरित्रवान बनने की प्रेरणा दी। उनके अनुसार व्यक्ति को अपने कर्मों के फल की इच्छा न रखते हुए अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। कर्म करते हुए मन को शुद्ध रखना और दूसरों की सेवा करना ही कर्मयोग की वास्तविक भावना है।
स्वामी विवेकानन्द ने युवाओं को विशेष रूप से कर्म, शक्ति, आत्मविश्वास और सेवा का संदेश दिया। उनका मानना था कि युवा वर्ग ही समाज और राष्ट्र के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त कुरीतियों और दुर्बलताओं को दूर करने तथा लोगों में आत्मविश्वास जागृत करने का प्रयास किया।
उनके कर्मयोग का उद्देश्य केवल व्यक्ति का विकास नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र का विकास भी है। यदि प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्तव्य को समझकर निःस्वार्थ भाव से कर्म करे, तो समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सकता है और राष्ट्र को मजबूत बनाया जा सकता है।
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. आधुनिक परिवेश में स्वामी विवेकानन्द के कर्मयोग की उपादेयता. Indian Journal of Modern Research and Reviews. 2026; 4(10):17-19
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